नियति का विधान मनुष्य चाहे कहीं भी चला जाये, कर्म उसका पीछा नहीं छोड़ता:
महाभारत में एक प्रसंग आया है, एक दिन धृतराष्ट्र ने भगवान कृष्ण को अपने यहां आमन्त्रित किया। उस समय धृतराष्ट्र काफी व्यथित थे। भगवान कृष्ण ने पूछा, क्या बात है राजन! आप इतने दुःखी क्यों लग रहे हैं? किस प्रयोजन से आपने मुझे याद किया?
धृतराष्ट्र बोले, हे वासुदेव! आप योगेश्वर हैं, परब्रह्म परमेश्वर के साकार रूप हैं, यह जानता हूँ मैं। बस आप मेरी विनती स्वीकार कर लें। मेरा मन काफी समय से उद्वेलित हो रहा है। केवल आप ही उस व्यथा का समाधान कर सकते हैं।
वासुदेव बोले, राजन! अपनी व्यथा तो व्यक्त करें। अगर मेरे सामर्थ्य में होगी तो उसे अवश्य दूर करूँगा।
धृतराष्ट्र बोले, भगवन! आज मेरे पास अपार सुख है, सम्पत्ति है, नाना प्रकार के भोग के साधन हैं लेकिन सब मेरे लिए व्यर्थ प्रतीत हो रहे हैं। सब कुछ होते हुए मैं देख नहीं सकता, यही मेरी व्यथा है। इसका क्या कारण है? बस, इसी का आप से उत्तर चाहता हूँ।
वासुदेव बोले, हो सकता है कि आपसे किसी जन्म में कोई बड़ा अपराध हुआ हो जो इस जन्म में भोगना पड़ रहा है जो कि नियति बनकर आपके सामने है। सारा सुख होते हुए भी आप सुख से वंचित हैं।
धृतराष्ट्र ने फिर प्रश्न किया, भगवन! यह नियति क्या है? पहले इसका रहस्य समझाएं।
भगवान कृष्ण बोले, मानव के अच्छे-बुरे कर्म मृत्यु के बाद जीवात्मा के साथ संस्कार रूप में चले जाते हैं। वह कर्म-संस्कार अनन्त काल तक जीवात्मा के साथ रहता है, जब तक उसका कर्मफल भोगकर क्षय नहीं हो जाता। जीवात्मा चाहे कितनी ही बार जन्म क्यों न ले ले। जब मनुष्य को दुःख या सुख मिलता है या अपार सुख के साधन होते हुए भी सुख-शान्ति नहीं मिलती तो मनुष्य यही कहता है कि इतना सारा पूजा-पाठ, दान-धर्म कर रहा हूँ, फिर भी दुःख, दुर्भाग्य कम नहीं हो रहा है। इसका वह कारण खोजता है। राजन! आप तो जानते हैं, वह संचित कर्म-संस्कार जब प्रकट होता है तो ऐसे समय में चाहे मनुष्य अपार सुख में रहे या रहे दुःख में, वही कर्म-संस्कार नियति बनकर कब प्रकट हो जाएगा, कोई नहीं जानता। जब नियति प्रकट होती है तो ईश्वर भी सहायता नहीं करता। नियति के विधान में वह न तो अपने लिए हस्तक्षेप करता है और न दूसरे के लिए। ईश्वर को भी नियति के विधान को मानना पड़ता है। ईश्वर सदैव तटस्थ रहता है। अगर मैं चाहूँ, वासुदेव ने कहा, तो मैं आपके नेत्र ठीक कर सकता हूँ। लेकिन जो आपका यह कष्ट है, वह नियति के कारण है।
तब धृतराष्ट्र बोले, आप कारण का तो पता लगा ही सकते हैं। कृपया मेरे दुःख के कारण को मालूम कर मेरे मन को हल्का कर सकते हैं।
भगवान बोले, इसका ज्ञान योगबल से हो सकता है।
इसके साथ ही भगवान ध्यानस्थ हो गए। वे एक-एक करके धृतराष्ट्र के पूर्व जन्म देखने लगे। जब भगवान चौदहवें जन्म में पहुँचे तब उन्होंने देखा कि धृतराष्ट्र उस जन्म में राजकुमार थे और पक्षियों का शिकार कर रहे थे।
धृतराष्ट्र ने एक पक्षी पर बाण चलाया, लेकिन बाण पक्षी के शिशु की आंख में जा लगा। उसके नेत्र फट गए और वह बुरी तरह तड़पने लगा। नेत्रों से रक्त बह निकला। उस बच्चे को उसी अवस्था में तड़पता हुआ छोड़कर वे चले गए। बच्चे की तड़प पर राजकुमार ने कोई पश्चाताप नहीं किया।
बड़े रहस्य की बात है। धृतराष्ट्र के चौदहवें जन्म के अपराध का फल इस जन्म में आकर मिला। इसी को कहते हैं नियति। नियति कभी भी प्रकट हो सकती है। नियति का विधान कठोर होता है। वह तब अक्सर प्रकट होती है जब मनुष्य सुख भोगने जा रहा हो।
भगवान बोले, राजन! उस समय आपने बच्चे की तड़प देखकर थोड़ा भी प्रायश्चित कर लिया होता, उस अबोध बच्चे की सहायता की होती जो आप कर सकते थे तो वह अपराध संस्कार के रूप में आपकी आत्मा पर अपनी छाप नहीं छोड़ता।
धृतराष्ट्र चुप रह गए। इससे यह स्पष्ट है कि नियति के विधान में न प्रकृति हस्तक्षेप करती है और न ईश्वर ही। मनुष्य का सकाम कर्म फल देकर ही क्षय होता है और भोग भोगना ही पड़ता है। मनुष्य चाहे कहीं चला जाये, कर्म पीछा नहीं छोड़ता।
जय जय श्री हरी



