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धर्म-विशेष

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

आलेख 
ब्रजेन्द्र चौबे 
गढ़ा ,जबलपुर 
94251 60167 

***** हे वासुदेव पुत्र . हे हरि. हे परमात्मा. हे कृष्ण . मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। आप शरणागतों के सभी क्लेशों और कष्टों (दुखों) का नाश करने वाले हैंहे गोविंदआपको मेरा बार-बार नमन है **** 

श्री पचमठा मंदिर वृन्दावन लघु काशी सेवा धामगढ़ाजबलपुर

चरण कमल हरिवंश बल। बन माली गुरु आस ॥ गोड देश पावन कियो। रसिक चतुर्भुज दास ॥

 

जबलपुर गढ़ाइसे वृन्दावनक्यों कहते हैविक्रम संमत् 1608 के करीबकि बात हैयहाँ गढ़ा मेंदो भक्त हुएथे एक नामदामोदर दास जोबाद मे सेवकजी के नामसे जाने जानेऔर दूसरे कानाम गिरधर दासहुआ जो बादमे चतुर्भुज दासजी हुए यहदो बालक संतोके सत्संग भजनकीर्तन संत सेवामे लगे रहते थे।

उसी समय एक संतो कि मंडली वृन्दावन से गढा मंडला जो कि आज पचमठा मंदिर के नाम से जाना जाता है आई यह दोनों बालक संतो कि इच्छी सेवा भाव से करते सत्संग करते थे एक दिन एक संत ने इन बालकों से पूछा आप दोनों किस कि शरणागति में हो किससे गुरू मंत्र लिया है तुमने। तब इन दोनों ने कहा महाराज जी अभी तक हमने किसी से गुरू मंत्र नही लिया क्योंकि महाराज हम लोग खुद राज्य गुरू घराने के है ओर सोच रहे है कि कोई ऐसा गुरू मिले जो परमात्मा से भेंट करा दे संत बोले बेटा ऐसा है तो इस समय वृन्दावन मे श्री हित हरिवंश जी गद्दी पर विराजमान हैं तुम उनको ही गुरू बनाओ तो अच्छा रहेगा। फिर क्या था दोनों बालकों ने संकल्प कर लिया कि अब तो हरिवंश जी को ही गुरू बनायेंगे संकल्प के करीब दो साल तक यह किसी कारणवश वृन्दावन नहीं जा सके ओर हित महाप्रभु श्री जी के निकुंज में पहुँच गये। फिर वृन्दावन से संतमडली आई और यह दोनों बालकों को पता चला जो इनका स्वभाव था कि संत सेवा भजन आदि करने लगे और बोले महाराज जी हम भी तं से गुरुमंत्र लेंगे। वह संत दुखी हुए बोले बेटा तुम लोगों ने समय बहुत लगा दिय अब तो हित हरिवंश जी गोलोक धाम पधार गये इन दोनों को बड़ा दुख हुआ। संत लोग बोले दुखी मत हो अब इस समय गद्दी पर वनचन्दय जी हैं अब तुम दोनों उन से ही गुरु मंत्र ले लो गिरधर दास जी तो वृन्दावन चले गये परन्तु दामोदर दास जी इसी पचमठा मंदिर गढ़ा में अपनी गुरू भक्ति में तल्लीन होकर सिर्फ श्री हरिवंश श्री हरिवंश के नाम का जाप किया। जब नाम जप करते हुए सात दिन हुए तब एक आमा प्रगट हुई बोले बेटा आँखे खोल देख में आगया दामोदर दास जी ने आँखे खोली तो देखा समाने एक दिव्य पुरुष खड़ा है जिसकी चौडी छाती, मस्तक पर तेज, मन मोहक मुखार बिन्द्र, दामोदर दास जी ने आपनी आँखों को मला फिर देखा बोले आप कौन ? वह बोले जिसे तू पुकार रहा है वही हरिवंश दामोदर दास जी बोले ऐसा हो ही नहीं सकता जो एक बार धारा धाम को छोड़कर गोलोक घाम चला जाता है वह लोट कर नहीं आता वह बोले में तेरी भक्ति के कारण आया हूँ। दामोदर दास जी बोले यदि आप हित महाप्रभु हैं तो मुझे यहाँ श्री वृन्दावन का दर्शन करा दो नहीं तो में समझेंगा कि मेरी भक्ति के साथ छल हो रहा है हित हरिवंश ने कहा नेत्र बंद करो जैसी ही दामोदर जी ने नेत्र बंद किया वैसे ही इसी पचमठा मंदिर गढ़ा वृन्दावन का दर्शन हुआ वही निधि वन सेवा कुज यमुना जी राधा कुन्ड श्याम कुंज आदि पूरा ब्रज प्रगट हो गया श्री युगल सरकार जी का दर्शन हुआ बोले आँख खोलो दामोदर जी यह सब देख भाव विमल हो हित हरिवंश जी के चरणों में लेट गये और अश्रुधारा बहने लगी ओर चरणों से लिपट गये। तभी श्री महाप्रभुजी ने अपना कर कमल उनके सिर पर रखा ओर गुरूमंत्र दिया। हित चौरासी वाणी दी, युगल कन्ठी दी। बोले अब तुम इस प्रेम रस का विस्तार करो और श्यामा श्याम - हित महाप्रभु फिर अंतर ध्यान हो गये। फिर दामोदर जी बहुत दुखी हुए और जंगलों में घूमने लगे, कभी वह रोने लगे, कभी हँसने लगे, कभी नाचने लगे, कभी जोर जोर से चिल्लाने लगे। श्री हरिवंश श्री हरिवंश उधर गिरधर दास जी ने वनचंदय महाप्रभु से गुरूमंत्र लेकर वापिस गढ़ा मंडला आये। तब वह अपने छोटे भाई को खोजने लगे। लोगों ने बताया वह आजकल जंगलों में ज्यादा नजर आते हैं। वह उनको खोजते हुए जंगल कि तरफ गये। कुछ दूर चलने पर उनको हरिवंश हों हरिवंश कि ध्वनि सुनाई दी वह उसी ध्वनि के पास पहुँचे तो दामोदर को देख दौड़ते हुए गले से लगा लिया भाई को। फिर कुछ होश आने पर देखा कि छोटे भाई के गले में वही कठी, वही तिलक, वहीं हित चौरासी वाणी देखी ओर उनका तेज देख समझ गये कि इनके ऊपर कृपा हो गई। फिर भी पूछे भाई यह सब कैसे। दामोदर बोले भैया सब गूरु कृपा से और दामोदर दास जी ने अपने मैया को पूरी लीला बताई और इसी सीन पर बैठकर दामोदर जू ने एक और वाणी लिखी जो सेवक वाणी के नाम से आज भी विख्यात है इसमें 16 प्रकरण हैं ओर इसी दिन से दामोदर दास का नाम सेवक जी पड़ा यह वाणी धीरे-धीरे वृंदावन पहुँची जब यह वाणी वनचंदय महाप्रभु को मिली तो वृन्दावन में हल्ला हो, कि गढ़ा मंडला में एक सेवक हुआ है जिसने हित महाप्रभु को प्रगट कर के गुरू मंत्र लिया है और उनको वंशी आवतार सिद्ध किया वनचंदय महाप्रभु ने घोषणा कर दी कि जिस दिन सेवक जी वृंदावन आयेंगे हम श्री जी का खाजोना लुटा देंगे ओर एक सेवक जी को लिखा और वह, पत्र सेवक जी को मिला वह बहुत दुखी हुए कि में वृन्दावन जाऊँगा तो श्री जी का खजाना लुट जायेगा नहीं जाऊँगा तो गुरू देव कि शपथ है सोचा ऐसे चले किसी को पता भी नहीं चलेगा ओर दर्शन करके वापिस आ जायेंगे सेवक जी वृंदावन आरती के समय पहुँच वनचंदय जी राधा बल्लभ जी आरती कर रहे थे ओर उनसे नेह मिला रहे थे यह उनका नित्य का नियम था कि ठाकुर जी से नेह मिलाना उस दिन ठाकुर जी नेह नहीं मिला रहे थे वह तुरंत समझ गये कि गढ़ा से सेवक जी आ गये आरती हुई देखा कि ठाकुर जी कि चितवन कहा जा रही ओर दोड कर सेवक जी गले लगाने के लिए जैसे ही हुए वह उनके चरणों में सेवक जी लिपट गये ओर रोने लगे फिर कुछ देर में अपने आपको संभालकर बोले आप श्री जी का खजाना मत लुटाओ सिर्फ प्रसादी लुटाओ बहुत उत्साह हुआ सात दिन सेवक जी वृंदावन में रहे फिर बडे रास मंडल मे वट वक्ष में जीयत लीन हो गये वक्ष बीच में से फटा और उस मे बह बैठे और वह पुनः बंद हो गया। बोलिए सेवक जी महाराज कि जय.

इसीलिए कहते है राधा वर नाम सो न वृन्दावन धाम सो न सेवक सो सेवक न गुसाई हरिवंश सो श्री राधे यह तो हुआ सेवक जी महाराज कि लीला अब चर्तुमज दास जी महाराज कि लीला, गिरधर दास जी को पता लगा कि दामोदर वृंदावन गया है तब वह सोचने लगे कि जब मे वृन्दावन गया तो इनको यहाँ श्री हित हरिवंश जी की कृपा हुई अब मैं यहाँ हूँ और वह वृन्दावन गये यह भी पीछे से वृन्दावन को गये जब यह पहुँच तब तक श्री सेवक जी वट वृक्ष में लीन हो चुके थे यह बहुत दुखी हुए ओर उसी वट वृक्ष के नीचे अचेत हो कर गिर गये रात्रि में श्री जी ने कृपा की दुखी क्यों होते हो प्रातः काल तुम यमुना में स्नान करो हम तुम को प्राप्त होंगे ओर तुम हमको लेकर वही गढ़ा में जहाँ सेवक जी ने वृंदावन प्रकट किया था वही हमारी अचल प्रतिष्ठा करो ओर धर्म का प्रचार करो जैसे ही प्रात: काल गिरधर दास जी ने यमुना जी में दुबकी लगाई वैसे ही श्री मुरलीधर जी हाथ मे आ गये आरे वृन्दावन में हल्ला मच गया कि एक भाई ने गढ़ा में वृन्दावन प्रघट किया ओर दूसरे को युगल सरकार प्राप्त हो गये तब पूरी संत मंडली गिरधर दास जी के साथ चल दी रास्ते में कई लीला कि जैसे चोरों का उद्धार भूतों का उद्धार और आदि फिर गिरधर दास जी ने विक्रम संवत् 1660 भादो का महीना शुक्ल पक्ष राधा अष्टमी के दिन श्री मुरलीधर जी कि अचल प्रतिष्ठा कि ओर धर्म का प्रचार किया।

युगल सरकार जहाँ विराजित है बहा पहले देवी का स्थान था और वह नित्य नर बली लिया करती थी। गिरधर दास जी कि देवी शिष्या हुई गुरु मंत्र लिया ओर जाकर राजा को सपन दिया में तो उनकी शिष्य हो कर जा रही हूँ यदि तू आपना कल्याण चाहता है तो जा उनकी शरण में राजा आपने परिवार सहित गिरधर दास जी कि शरण में आया और महाराज जी से दीक्षा लिया और उसी दिन से पूरी व्यवस्था मंदिर कि देखने लगा। महाराज जी श्री जी कि सेवा में लगे थे।

श्री जी का भंडारा चल रहा था गिरधर दास जी चावलों का थाल लिये हुए परोसने निकले वह श्री जी का कैसरिया चन्द लगाये हुए थे जब संतों ने देखा तो उनको लगा कि महाराज जी को तो कोढ़ है धीरे-धीरे यह चर्चा कर रहे थे तो यह महाराज जी के कानों तक पहुँची वह सोचने लगे में तो श्री जी कि प्रसादी चन्द लगाये हुए हूँ यदि कोई संत उठ गया तो क्या होगा यही सोच रहे थे कि उनकी लंगोटी खुल गई केवल एक ही लंगोटी लगाते थे। गिरधर दास जी ने सोचा यदि चावल का थाल नीचे रखे तो अपवित्र और लंगोटी नहीं संभालता हूँ तो संत समाज में हंसी होगी फिर उनने इस पचमठा मंदिर में ही श्री मुरलीधर जी का ध्यान किया तो दोनों टहनियों से दो भुजायें निकलीं दो हाथ थाल लिए हुए थे और दो हाथों ने लंगोटी लगाई उसी समय वहीं बैठे सभी संत कहने लगे स्वामी चतुर्भुज दास जी महाराज कि जय उसी दिन से गिरधर दास जी का चतुर्भुज दास जी हो गया और उसी दिन से धर्म का प्रचार।चरण कमल 

हरिवंश बल। बन माली गुरु आस ॥

गोड देश पावन कियो। रसिक चतुर्भुज दास ॥

उसी समय यहाँ इतना बड़ा संस्कृत विद्यालय था कि यहाँ 700 विधार्थी विद्या अध्ययन करने काशी से यहाँ आते थे काशी में पृवेश लेते थे और विद्या अध्ययन यहाँ करते थे इसीलिए इस लघ काशी भी कहते हैं सेवक जी ने यहाँ वृंदावन प्रगट किया इसी लिए पचमठा मंदिर वृन्दावन लघु काशी सेवक धाम कहते है यह सब प्रमाण स्वामी चतुर्भुज दास जी के द्वारा लिखते व्दादश यश में है फिर इस स्थान कि व्यवस्था यहाँ के राजा देखते थे चतुर्भुज दास जी के वंशज सेवा किया करते थे ओरगदेग के समय सीन का पतन हो गया जबलपुर से कुछ लोग वृन्दावन जाते थे वृन्दावन में इसका इतिहास था फिर वहाँ से खोज किया गया। सन 1950 से फिर स्थान का पता चला कि यही वृन्दावन है फिर 1964 टेस्ट बनाया गया फिर पूजा पाठ शुरू हुआ फिर 1971 से पुजारी कामता प्रसाद जी पूजा कर रहे है यहाँ युगल सरकार के आलावा द्वादश ज्योतिर्लिंग, हनुमान जी, सूर्य भगवान, सरस्वती जी, अन्नपूर्णा जी, गनेश जी, विष्णु जी, नर्मदा जी आदि देवता हैं यह सब लगभग 600 वर्ष पुराने है। सन् 2005 में टेस्ट में नये सदस्य गण आये। तब से निरंतर भक्तों के सहयोग से विकास कार्य चल रहा है ठाकुर जी तभी से यहाँ लीला करते है ओर आज भी करते है जैसे चरण लीला दुधिया लीला वंशी आदि लीला।