मूर्ख न बन ऐ बंदे ,,,,,
एकबार एक #सिद्ध संत श्री मोहन देव जी वृंदावन आए ! उन्होंने बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त कर रखी थी ! वृंदावन में वो एक शाम को यमुना जी के किनारे बैठे थे ! वहीं एक वृद्ध संत बैठे थे जो *'राधा राधा राधा'* नाम का निरंतर जप कर रहे थे !
सिद्ध संत मोहनदेव जी बोले "बाबा बस नाम ही रटते रहते हो या कुछ पाया भी है ?"
संत बोले "बाबा" हमें तो कुछ और पाने की ईच्छा नही है ! जो पाना था वो यही नाम है सो मिल गया !!
आप क्या पाने की बात कर रहे है ?"
मोहनदेव जी तो शायद इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे कि उन्हें सिद्धियां दिखाने का अवसर मिले !
इसी बीच वृद्ध संत तपाक से बोले दिखाइये अपनी सिद्धियों की एक झलक !!! "देखे क्या दिखाते है !"
वो उठे कुछ बुदबुदाए और यमुना जी के जल पर ऐसे चलने लगे जैसे भूमि पर चल रहे हो ! पूरी नादिया पार करी और वापस आकर बोले -
"देखा बाबा कैसा चमत्कार ! ये पाया हमने !"
वृद्ध सन्त / वृंदावन के संत ने पास खड़े एक मल्लाह को बुलाया और पूछा "क्यूँ भाई नादिया पार जाने का क्या लोगे ?"
वो बोला "बाबा आपसे कुछ नही ले सकता !"
बाबा पुनः बोले "भाई हमें जाना नही किंतु साधारणतः क्या लेते हो ?"
मल्लाह बोले "बाबा चार आना !"
बाबा मोहनदेव जी से बोले "भाई जो काम चार आने में हो सकता है" उसे सिद्ध करने के लिए तुमने जीवन गंवा दिया !"
"मिथ्या अभिमान और व्यर्थ की नौटंकी दिखाने के अलावा क्या हाथ लगा ?"
भाई जो जीवन चला गया और हरी ना मिले तो ?
"सिद्ध संत की आँखों से आंसुओं की धारा बह चली और गला रुंध गया और एक शब्द न निकला" !
यही सार है !!!!!
जीवन में सब मिल जाए पर जो *'हरी'* न मिले तो धिक्कार है स्वयम पर ! न जाने ये जीवन दुबारा मिलेगा या नही और हम इसको यूँ ही व्यर्थ कर दे !
मूर्ख न बन ऐ बंदे ,,,,,
*सब कर न कर पर उनका नाम ना रुकने पाए उनका स्मरण और जाप अवरुद्ध न होने पाए तभी आपके अन्तःकरण से अन्धकार दूर होगा और सत्य ज्ञान का प्रकाश फैलेगा !!*
*!!.. राधे राधे ..!!*


