चाहे कितना भी पूजा पाठ दान धर्म जप तप आदि करोड़ों पुण्य के, काम करने के बाद भी कुछ मनुष्य नरक में ही क्यों जाते हैं
प्राचिन कथा ? भगवान विष्णुजी ने कहा
चाहे कितना भी पूजा पाठ दान धर्म जप तप आदि करोड़ों पुण्य के, काम करने के बाद भी कुछ मनुष्य नरक में ही क्यों जाते हैं तथा अत्यधिक घोर पाप करने पर भी कुछ मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति किस पुण्य के कारण मिलता है, ऐसा वह कौन सा पुण्य है जो मनुष्य के करोड़ों पापों का नाश करता है और ऐसा वह कौन सा पाप है जो उसके करोड़ों पुण्यं को नष्ट कर देताहै, तो दोस्तों अगर आपके पास थोरा सा समय है तो इस आर्टिकल पढ़ये आपको आपकी सबाल की जवाब इस आर्टिकल में मिल जाएंगे, दोस्तों इस कथा की शुरुआत करते हैं ,,
भगवान विष्णु शीर सागर में देवी लक्ष्मी के साथ शेष नाग की शैया पर विश्राम कर रहे थे जल की लहरें शांत रूप से बह रही थी और आकाश में एक दिव्य शांति फैला हुआ था उसी समय देवर्षि नारद जी वहां उपस्थित हुए उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएं था और भगवान विष्णु ने उन्हें देखते ही कहा आइए देवर्ष शीर सागर में आपका स्वागत है, आज किस प्रयोजन से पधारे हैं, अवश्य ही कोई महत्त्वपूर्ण समाचार लेकर आए होंगे नारद जी ने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और बोले हे प्रभु मैं यमपुरी की यात्रा करके आ रहा हूं वहां मैंने एक अद्भुत घटना देखा जो मेरे समझ से परे है मैंने देखा कि कुछ पुण्यात्मा नरक में जा रहा था जबकि कुछ पापी स्वर्ग में, यह देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कृपया मुझे यह बताइए कि कौन नरक जाता है और कौन स्वर्ग और यह कैसे तय होता है, भगवान विष्णु ने नारद की बात सुनकर मुस्कुराते हुए कहा, हे देवर्षि, संसार में कर्मों का फल मनुष्य के आंतरिक उद्देश्य और विवेक पर निर्भर करता है, कई बार जो प्रकट रूप से पुण्य दिखते हैं वे भी पाप हो सकते हैं इस विषय में एक प्राचीन कथा है जो आज मैं आपको सुनाता हूं इस कथा को सुनकर आपको आपके सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे इसीलिए आप इस कथा को ध्यान से पूरा अवश्य सुनिए जो भी इस कथा का श्रवण करता है उसके कोटि कोटि पाप नष्ट होते हैं और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होता हे, देवर्षि कहते हैं हे प्रभु आपके मुख से इस कथा को सुनना मेरा सौभाग्य है मैं इस कथा को ध्यान से पूरा अवश्य सुनूंगा और इसका प्रचार भी करूंगा फिर भगवान विष्णु नारद जी को वह कथा सुनाने लगते हैं यह कथा अत्यंत ज्ञानवर्धक है इस कथा में मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले पाप और पुण्यं का वर्णन किया गया है तथा उसके आधार पर मिलने वाली सजाओ के बारे में बताया है इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को यह कथा ध्यानपूर्वक पढ़ लिजिए आधा अधूरा ज्ञान घातक होता है इसलिए दोस्तों आप इस कथा को पूरा अवश्य पढ़ि लिजिए,,,
अब भगवान विष्णु देवर्षि को कथा सुनाता है,,
भगवान विष्णु कहते हैं हे देवर्षि पूर्व काल की बात है मध्य देश के एक नगर में एक ही समय पर पांच मनुष्यों की मृत्यु हो जाता है और वे सभी मृत्यु के पश्चात यमलोक में पहुंच जाते हैं, यमलोक पहुंचने पर वहां का दृश्य देखकर वे सभी भयभीत हो जाते हैं उनका अंग अंग कांपने लगता है यमलोक में विशाल काय आकार वाले यमराज सुवर्ण से बने सिंहासन पर विराजमान होते हैं उनके पास चित्रगुप्त बैठे होते हैं जिनके पास सभी प्राणियों का लेखा जोखा रखा हुआ है यम के दूत प्राणियों को आगे धकेल रहे होते हैं कुछ मनुष्य जोर-जोर से विलाप कर रहे होते हैं तो कुछ मनुष्य अत्यंत प्रसन्न होकर चल रहे होते हैं स्वर्ग के द्वार से सुंदर प्रकाश दिखाई पड़ रहा होता है तो वही नरक के द्वार से धधकती हुई अग्नि की ज्वाला एं दिखाई पड़ रही होती है इस भयानक दृश्य को देखकर वे पांचों एक दूसरे से बात करने लगते हैं और अपने-अपने पाप के विषय में चर्चा कर रहे होते हैं उन पांच में से चार लोगों ने अपने जीवन में बहुत पाप कर्म किए हुए होते हैं और उन सभी को यह जान पड़ता है कि अब वे चारों ही नरक में ही जाने वाले हैं उन चारों में एक चोर होता है दूसरी वेश्या होती है तीसरा विद्वान ब्राह्मण होता है तो चौथा एक राजा का सैनिक होता है तथा पांचवा एक धनवान किसान होता है वे पांचों अपने अपने कर्म फलों को भुगतने के लिए तैयार होते हैं फिर एक-एक करके सभी पापी और पुण्य आत्माएं आगे चल रही होती हैं वे चारों एक दूसरे के पाप कर्मों के बारे में बताने लगते हैं सबसे पहले वह चोर बोलने लगता है उसकी आवाज कांप रही थी और उसके चेहरे पर गहरा पछतावा था उसने गहरी सांस लेते हुए कहा भाइयों मेरा नाम हरिदास है मैं जानता हूं कि मैंने जीवन भर बहुत पाप किए हैं मैंने दूसरों का धन चुराया उन्हें तकलीफ दी और कभी-कभी उनका जीवन भी बर्बाद किया मैं जानता था कि जो मैं कर रहा हूं वह गलत है लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था परिवार भूखा था मेरे पास कोई काम नहीं था और हर कोई मुझे दुत्कार था मैंने चोरी से जो धन पाया उससे मैंने अपने परिवार का पेट भरा पर अब मुझे इस बात का पछतावा है कि मैंने कितने लोगों को दुख पहुंचाया अब यमराज मुझे दंड देंगे मुझे डर है कि मुझे नरक की यातनाएं झेलनी पड़ेंगी यह कहते हुए हरिदास की आंखों से आंसू बहने लगे उसकी आवाज थरथरा लगी और उसका चेहरा अपराध बोध से भर गया इसके बाद कमलिनी जो एक वेश्या थी अपनी व्यथा व्यक्त करने लगी उसकी आवाज में भी दर्द और ग्लाने थी उसने गहरी उदासी के साथ कहा मेरा नाम कमलिनी है मैं जानती हूं कि शास्त्रों के अनुसार जो स्त्री कई पुरुषों से संबंध बनाती है उसे नरक में भेजा जाता है लेकिन मैंने यह सब जानबूझकर नहीं किया जब मैं छोटी थी एक दुष्ट व्यक्ति ने मुझे जबरदस्ती उठाकर वेश्या बना दिया मेरी इच्छा नहीं थी कि मैं यह जीवन जिऊं मैं चाहती थी कि मैं किसी सम्मानजनक जीवन में होती लेकिन मेरे पास कोई रास्ता नहीं था मैंने ना चाहते हुए भी वह सब सहा जो मेरे साथ हुआ अब मुझे नहीं पता कि मेरे इन पापों का क्या होगा मुझे यह भी नहीं पता कि अगले जन्म में मुझे किस रूप में जन्म लेना पड़ेगा मैं नरक जाने के लिए तैयार हूं क्योंकि मैंने जो कुछ किया उसकी कोई माफी नहीं हो सकती कमलिनी की आंखों से आंसू बहने लगे उसकी आत्मा में गहरा दर्द था मानो वह अपने पूरे जीवन का भार अपने कंधों पर महसूस कर रही हो उसकी आंखों में वह पीड़ा झलक रही थी जिसे उसने सालों तक छुपाए रखा था फिर सूर्य केतु जो राजा का सैनिक था उसने बोलना शुरू किया उसकी आवाज भारी और उदास थी मानो उसे अपने जीवन के पापों का एहसास हो रहा हो उसने दुख भरे स्वर में कहा भाई मेरा नाम सूर्य केतु है हम चारों में सबसे बड़ा पापी तो मैं ही हूं मैंने बहुत बड़े पाप किए हैं मैं राजा का सिपाही था इसीलिए मैं लोगों पर जोर जबरदस्ती करता था मैंने कितनों के प्राण लिए हैं ना जाने कितने मासूम लोगों को सताया है ना जाने कितने निर्दोष लोगों को मेरे हाथ से दंड मिला है यमराज मुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे और मैं निश्चित ही नरक में ही जाऊंगा लेकिन मैंने यह सभी पाप जानबूझ करर नहीं किए हैं अपने प्राणों के भय से और परिवार के पालन पोषण के लिए मुझे यह पाप करने पड़े हैं हमारा राजा जो कहता था उसका पालन हमें करना पड़ता था राजा के विरुद्ध भला कोई साधारण मनुष्य कैसे जा सकता है यह सभी पाप करते हुए मुझे अत्यंत दुख भी होता था और मैं जानता था कि यह पाप करने से मुझे नरक की ही प्राप्ति होगी किंतु परिवार के मोह वश होकर मैंने यह काम किया है लेकिन पाप तो पाप होता है पाप करके पश्चाताप करने का क्या फायदा इसीलिए मेरा नरक में जाना तो तय है उसके बाद वह वो विद्वान पंडित बोलता है भाई हम चारों में से सबसे बड़ा पापी तो मैं हूं तुम लोगों ने जो पाप किए हैं व जाने अनजाने में किए हैं या किसी ने तुमसे जबरदस्ती करवाए हैं या मजबूरी में किए हैं किंतु मैं तो विद्वान था मैं सब सत्य असत्य जानता था मुझे सच और झूठ का ज्ञान था लेकिन फिर भी मैंने धन के लोभ वश यह पाप किए हैं शास्त्र कहते हैं कि जो सब कुछ जानकर भी पाप करता है वह निश्चित ही नरक में गिरता है मैंने अपने ज्ञान का दुरुपयोग किया है मैंने अपने ज्ञान का उपयोग लोगों की सहायता के लिए नहीं बल्कि धन को कमाने के लिए किया है मेरे घर की परिस्थिति अत्यंत गरीब थी मेरे पिता भिक्षा मांगकर गुजारा करते थे लेकिन मैंने अपने घर की गरीबी को दूर करने के लिए धन लेकर ज्ञान देने की चेष्टा की है शास्त्र कहते हैं जो विद्वान ब्राह्मण अपने ज्ञान का दुरुपयोग करता है उसे निश्चित ही नरक में जाना पड़ता है मैंने लोगों को ज्ञान देने के बदले में उनसे धन लिया है कभी किसी को मुफ्त में ज्ञान नहीं दिया इसीलिए आप चारों में सबसे बड़ा पापी तो मैं ही हूं और मुझे ही नरक में जाना पड़ेगा वाचस्पति के चेहरे पर पश्चाताप की गहरी लकीरें साफ दिखाई दे रही थी उसकी आंखों में आंसू थे और उसका सिर शर्म से झुका हुआ था वह अपनी आत्मा के बोस से टूट चुका था इन चारों की बात सुनकर महिपाल जो एक घमंडी किसान था हंसने लगा उसके चेहरे पर घमंड और अहंकार साफ दिख रहा था उसने ताने मारते हुए कहा तुम चारों तो इतने बड़े पाप हो कि तुम लोगों को नरक में जाना ही पड़ेगा तुम लोगों ने घोर पाप किए हैं और इसीलिए यमराज तुम लोगों को कभी माफ नहीं करेंगे यहां पर मौजूद मैं अकेला ही सबसे अधिक पुण्यवान हूं मैंने अपने जीवन में बहुत पूजा पाठ किया है ब्राह्मणों को दान दक्षिणा दी है मैंने मृत्यु से पूर्व गाय का दान भी किया है और अब मेरे सभी पुत्र पौत्र मेरी आत्मा की मुक्ति के लिए बड़े कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं वे मेरे लिए श्राद्ध दान तर्पण कर रहे हैं यज्ञ कर रहे हैं इसीलिए मैं सबसे अधिक पुण्यवान हूं मेरी तीन पत्नियां और 10 पुत्र हैं इतने लोग मेरी मुक्ति के लिए उपाय कर रहे हैं और हां मैंने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया है और जाने अनजाने में किए भी होंगे तो मेरे पुत्रों के श्राद्ध आदि के कार्यों द्वारा मेरे पाप भी नष्ट हो जाएंगे मैं नित्य देव पूजा करता था मंदिर जाता था पर आए अतिथियों को भोजन कराता था इसीलिए मुझे पूरा विश्वास है कि यमराज मुझे नरक में नहीं डालेंगे और मुझे मोक्ष की प्राप्ति निश्चित ही होगी फिर वे पांचों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगते हैं और फिर जब उनका समय आता है तो उन पांचों के पाप और पुण्य के कर्मों का मूल्यांकन किया जाता है सबसे पहले बारी आती है उस चोर की जिसका नाम हरिदास था हरिदास का हिसाब किया गया चित्रगुप्त ने उसके कर्मों का लेखा जोखा निकाला और यमराज ने उसका पाप पुण्य का मूल्यांकन किया कुछ समय तक विचार करने के बाद यमराज ने निर्णय लिया कि हरिदास को स्वर्ग का मार्ग प्राप्त होगा यह सुनकर हरिदास आश्चर्य चकित हो गया उसकी आंखों में विश्वास नहीं हो रहा था कि उसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा वह प्रसन्नता से स्वर्ग के द्वार की ओर बढ़ गया इसके बाद कमलिनी की बारी आई चित्रगुप्त ने उसके कर्मों का लेखा जोखा निकाला और यमराज ने उसके पाप पुण्य का मूल्यांकन किया और कुछ देर तक विचार करने के बाद उसके पाप पुण्य का मूल्यांकन करके यमराज उसे भी स्वर्ग में जाने के लिए कहते हैं यह सुनकर कमलिनी की आंखों में आंसू आ गए उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी इतनी बड़ी गलती के बाद भी उसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा वह आभार से भरी हुई बिना कुछ कहे स्वर्ग के द्वार की ओर चल पड़ी फिर तीसरी बारी आती है उस सिपाही की जिसका नाम सूर्य केतु था चित्रगुप्त ने उसके भी कर्मों का हिसाब किया और यमराज ने उसका पाप पुण्य का मूल्यांकन किया कुछ देर विचार करने के बाद यमराज ने उसे भी स्वर्ग में भेजने का आदेश दिया सूर्य केतु के चेहरे पर एक मिश्रित भाव था पछतावा और प्रसन्नता उसने अपने जीवन में किए गए पापों का दुख महसूस किया परंतु वह भी प्रसन्नता के साथ स्वर्ग की ओर चल पड़ा फिर चौथी बारी आती है उस विद्वान ब्राह्मण की जिसका नाम वाचस्पति था चित्रगुप्त उस ब्राह्मण के कर्मों का लेखा जोखा निकालते हैं और कुछ देर तक विचार करते हैं फिर यमराज उस ब्राह्मण को भी स्वर्ग में जाने के लिए कहते हैं फिर वह विद्वान ब्राह्मण विचार करता है मैंने तो पाप किया है फिर मुझे क्यों स्वर्ग में भेज रहे हैं वाचस्पति को भी यह निर्णय आश्चर्य चकित कर गया परंतु उसने इसे स्वीकार किया और वह भी स्वर्ग की ओर बढ़ गया उन चार को स्वर्ग में जाता देख वह धनवान किसान बहुत दुखी और क्रोधित हो जाता है वह सोचने लगता है कि यह कैसा न्याय है इन पापियों को स्वर्ग जाने का मौका मिल रहा है फिर मैंने जो पुण्य के काम किए हैं उनका क्या पापी और पुण्यवान एक ही जगह पर डाले जाएंगे तो पुण्य करने का फायदा ही क्या फिर उस धनवान किसान को यम के दूत जोर से धकेल देते हैं और कहते हैं अरे पापी तू आगे चल तुझे नरक में डाला जाएगा यमराज तुझे माफ नहीं करेंगे यह सुनकर वह धनवान किसान भयभीत हो जाता है और कहने लगता है मैं तो स्वर्ग में जाऊंगा मैंने कोई पाप नहीं किया है फिर वह धनवान किसान यमराज के सामने आकर खड़ा हो जाता है चित्रगुप्त उसके कर्मों का लेखा जोखा देखते हैं और उसके पाप पुण्य के कर्मों का मूल्यांकन करते हैं तो उसके पाप का पलड़ा भारी हो जाता है और यमराज उस धनवान किसान को कहते हैं अरे दुष्ट तू ने तो बहुत बड़ा अपराध किया है तू तो नरक में जाने के ही योग्य है इतना सुनते ही वह किसान थरथर कांपने लगता है और यमराज से कहता है हे धर्मराज यह अन्याय है मैंने तो जीवन में कोई पाप नहीं किए है और पुण्य ही किए है आप मुझे नरक में क्यों डाल रहे हैं और मुझसे पहले जो चार लोग गए थे वे तो घोर पापी थे उन्होंने बड़े बड़े पाप और अपराध किए हैं उन्हें तो आपने स्वर्ग में डाल दिया है आप ऐसा अन्याय मेरे साथ क्यों कर रहे हैं अगर ऐसा अन्याय होगा तो भले कौन सा मनुष्य धरती पर पुण्य करेगा फिर यमराज कहते हैं अरे पापी तूने जो पाप किया है वह तो उन चारों के पापों के सामने कुछ भी नहीं है तेरे एक पाप के कारण तेरा सारा पुण्य फल नष्ट हो गया है यदि तूने यह पाप नहीं किया होता तो तू स्वर्ग में जा सकता था लेकिन तूने यह पाप जानबूझकर किया है इसीलिए तुझे नरक में अवश्य जाना पड़ेगा राज ने कहा हरिदास ने अपने जीवन में चोरी की थी परंतु उसने कभी किसी गरीब या निर्दोष व्यक्ति के घर चोरी नहीं की वह केवल उन लोगों के घर चोरी करता था जो अमीर और अहंकारी थे उसने अपने द्वारा चुराए गए धन का अधिकांश हिस्सा गरीबों और भूखों को भोजन कराने में खर्च किया हरिदास का हृदय दयालु था और उसने अपने जीवन में कई भूखों को अन्न और पानी दिया है उसके यह पुण्य उसके पापों से बड़े थे इसलिए उसे स्वर्ग का मार्ग प्राप्त हुआ यह सुनकर महिपाल ने सिर झुकाया उसकी आंखों में पछतावा दिखने लगा लेकिन यमराज ने उसे अधिक समय दिए बिना आगे कहा हे दुष्ट वह कमलिनी वेश्या थी परंतु उसने यह पाप जानबूझकर नहीं किया उसे जबरन वेश्यावृत्ति में धकेला गया था लेकिन उसने अपने जीवन के अन्य समय में पशु पक्षियों और बेसहारा जानवरों की सेवा की उसने हर रोज पक्षियों को दाना डाला और घायल जानवरों की देख भाल की उसकी आत्मा में करुणा थी और उसके यह पुण्य उसके जीवन के पापों से अधिक थे इसलिए उसे भी स्वर्ग में स्थान मिला फिर यमराज ने कहा उस सिपाही सूर्य केतु ने अपने जीवन में अनगिनत लोगों के प्राण लिए हैं परंतु वह अपने राजा के आदेशों का पालन कर रहा था उसने कई बार अपनी आत्मा को यह समझाने की कोशिश की कि जो वह कर रहा है वह गलत है लेकिन अपने परिवार की सुरक्षा और पेट पालने के लिए उसने यह काम किया परंतु इसके बावजूद उसने कई बेसहारा लोगों की सहायता की उसने कई बार गरीबों को भोजन कराया और अपने के पापों का पश्चाताप भी किया इसीलिए उसके पुण्य उसके पापों से अधिक निकले और उसे भी स्वर्ग प्राप्त हुआ महिपाल अब और भी अधिक शर्मिंदा हो गया उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे लेकिन यमराज ने उसे अपने अंतिम निर्णय के लिए तैयार किया यमराज ने कहा उस ब्राह्मण वाचस्पति ने अपने ज्ञान का दुरुपयोग किया था उसने धन के लोभ में आकर अपने शास्त्रों के ज्ञान का व्यापार किया परंतु उसने अपने जीवन में कभी किसी को मुसीबत में नहीं छोड़ा उसने निर्धनों की सहायता की गौ सेवा की और अपनी विद्या के माध्यम से कई लोगों का उद्धार किया उसके यह पुण्य उसके पापों से बड़े थे इसलिए उसे भी स्वर्ग का मार्ग प्राप्त हुआ इतना सुनकर वह धनवान किसान बोलता है हे धर्मराज इन चारों ने जो भी भी पुण्य किए हैं वह तो मैंने भी किए हैं बल्कि उनसे ज्यादा किए हैं फिर भी मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है जो मुझे नरक में भेजा जा रहा है यमराज कहते हैं हे दुष्ट याद कर तूने उस अबला विधवा नारी पर गलत लांछन लगाया था कि उसने तेरे घर पर चोरी की है और इसके साथ ही तूने उसके ऊपर कई अन्य गलत लांछन लगाए थे उसे व्यभिचारिणी और वेश्या कहकर उसके चरित्र का हनन किया है और राजा ने उसे स समझकर उस अबला विधवा नारी को मृत्यु दंड दे दिया था महिपाल तुमने जीवन में कई पुण्य किए परंतु एक पाप ने तुम्हारे सभी पुण्यं को नष्ट कर दिया तुम्हारा झूठा आरोप वह निर्दोष स्त्री पर जिसने उसकी जान ले ली वह तुम्हारे सारे पुण्यं का विनाशक बना मनुष्य के पुण्य और पाप दोनों ही उसके कर्मों का फल होते हैं लेकिन दूसरों पर झूठे आरोप लगाने का पाप सबसे बड़ा होता है और इसका प्रायश्चित नहीं हो सकता इसलिए तुम्हें नरक जाना होगा महिपाल अब भयभीत हो गया उसने कांपते हुए कहा परंतु मैंने ऐसा जानबूझकर नहीं किया था मुझे नहीं पता था कि मेरे इस आरोप से उसकी मृत्यु हो जाएगी मैं केवल अपने धन की रक्षा कर रहा था यमराज कहते हैं हे पापी मनुष्य ब्रह्म हत्या चोरी मदिरापान आदि प्रकार के घोर पापों से भी प्रायश्चित करके मुक्त हो सकता है किंतु दूसरों पर गलत लांछन लगाने पर कोई प्रायश्चित नहीं है जो दूसरों पर गलत आरोप करता है सत्य जानकर भी दूसरों को झूठ कहकर उनके ऊपर दोष डालता है वह तो सबसे बड़ा पापी है उसके द्वारा किए गए सभी पुण्य नष्ट हो जाते हैं इसीलिए तूने जितने भी पुण्य किए हैं वे सभी उस एक पाप के कारण नष्ट हो गए महिपाल की आंखों से आंसू बहने लगे उसकी आवाज कांप रही थी जब उसने कहा हे धर्मराज मैंने अपने जीवन में अनेकों दान किए देवताओं की पूजा की ब्राह्मणों की सेवा की परंतु यह एक पाप जिसे मैंने सोचा भी नहीं था कि इतना बड़ा होगा मेरे सारे पुण्य नष्ट कर देगा क्या कोई प्रायश्चित नहीं है जिससे मैं इस पाप से मुक्त हो सकूं यमराज ने उसे कठोरता से देखा और कहा नहीं महिपाल तुमने अपने जीवन में उस निर्दोष स्त्री पर जो आरोप लगाए थे उनका परिणाम यह है कि तुम्हारे पुण्य सभी नष्ट हो गए अब तुम्हें नरक की यातना हों का सामना करना पड़ेगा फिर यमराज यमदू तों को कहकर उस पापी किसान को नरक ले जाने के लिए कहते हैं महिपाल यमराज के इस कठोर निर्णय से टूट चुका था वह रोता बिलख यमदू तों द्वारा नरक की ओर ले जाया जाने लगा उसके मन में केवल पछतावा और ग्लानि थी हे देवर्षि इस प्रकार से उन चारों ने पाप करके भी उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई है किंतु उस किसान ने जघन्य अपराध किया है किसी अबला स्त्री पर गलत लांछन करके उसका चरित्र हनन किया है एक स्त्री सदा ही पूजनीय है जो भी पुरुष स्त्री पर गलत आरोप करता है उसे महापाप लगता है कभी किसी स्त्री की दुर्बलता का फायदा नहीं उठाना चाहिए पराई स्त्री को सदैव ही माता समझना चाहिए जो पराई स्त्रियों पर गलत दृष्टि डालता है उसे पाप ही लगता है जो विधवा दुखिया स्त्री को सताता है उसे नरक में जाना पड़ता मनुष्य को कभी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए सत्य के मार्ग पर चलकर ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है असत्य का साथ देने से मनुष्य के सभी पुण्य भी नष्ट हो जाते हैं तो दोस्तों कभी किसी पर गलत आरोप नहीं करना चाहिए सत्य जानकर भी असत्य का साथ नहीं देना चाहिए जो दूसरों पर गलत आरोप डालता है उसे यमराज कभी क्षमा नहीं करता है,, तो दोस्तों हमें उम्मीद है आपको यह कथा पसंद आए होगें,,, धन्यवाद,,,



