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धर्म-विशेष

सच्चा मन और समर्पण भाव महाप्रभु पढ़ लेते हें

सच्ची घटना।

प्रेम से कहिए.. श्री बांकेबिहारी लाल की जय

बात लगभग 10 -12 वर्ष पुरानी है।दिल्ली में एक भक्त जा रहा था तो रास्ते में उसने बांके बिहारी जी की फोटो लगी हुई देखी। कुछ देर तक वह उस फोटो को निहारता रहा बाद में उसने अनुमान लगाया यह शायद माता काली की फोटो है। कुछ समय बाद वह एक भागवत कथा में गया वहां व्यास जी महाराज के पीछे बांके बिहारी जी का चित्र लगा था उसे याद आया यह तो वही काली माता की फोटो है। दो-तीन घंटे कथा पर बैठने के बाद उसे ज्ञान हुआ कि यह तो वृंदावन के बांके बिहारी जी हैं और भक्तों सोचने लगा इनकी फोटो इतनी अट्रैक्टिव है तो वास्तविकता में कितने अट्रैक्टिव होंगेवह व्यक्ति और कोई नहीं 10वीं 12वीं में पढ़ने वाला एक छात्र था उसने निर्णय लिया वह समय निकालकर वृंदावन जाएगा लेकिन आज से पहले कभी वृंदावन गया नहीं था उसके पता नहीं था वृंदावन का है आखिर उसने एक रिक्शे वाले से पूछा भैया यह वृंदावन कहां पड़ेगावहां जाने के लिए बस मिलेगी ट्रेन मिलेगी कहां से कैसे जाना पड़ेगा?उस रिक्शेवाले ने कहा दिल्ली में निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन या सराय काले खां बस स्टैंड से आपको मथुरा की बस या ट्रेन देनी पड़ेगी वहां से पास में ही है वृंदावन। वह वक्त बस स्टैंड पहुंचा और जा करके उसने मथुरा की बदली बस वाले को कहा भैया वृंदावन जाना है। कहां उतरना है तो बस के कंडक्टर ने कहा आप छटीकरा उतर जाना। छटीकरा उतर के उसने ऑटो से वृंदावन पहुंचा लेकिन गुरु पूर्णिमा का दिन था अत्यंत भीड़ बहुत पहले ही उसे उतार दिया गया वह पैदल पहुंचा बिहारी जी का मंदिर पूछते हुए। बहुत भीड़ से होता हुआ वह बांके बिहारी जी के मंदिर पहुंचा जा बांके बिहारी जी का पर्दा खुला तो अंदर देखता है कोई दिखाई ही नहीं दे रहा दोनों तरफ जोत जलती हुई दिखाई दे रही है सिर्फ। वह कुछ समझ नहीं पाया अत्यंत भीड़ के कारण बिना दर्शन के ही गार्ड ने उसको मंदिर के गेट से बाहर निकाल दिया बाहर आकर वह भक्त व्याकुल होने लगा फिर दोबारा प्रयास किया मंदिर में जाने का। तो किसी ने कहा इस तरफ से सिर्फ प्रसाद वाले का रास्ता है। उसने सुना उसने भी प्रसाद लिया ले करके पहुंचा और ऊपर बिहारी जी को प्रसाद चढ़ाने के लिए पहुंचा पंडित जी बोले इसको कोई दक्षिणा रखो। जेब में हाथ डाला और याद आया कि पैसे तो बड़े कम बचे हैं वापस दिल्ली भी जाना है और सोच विचार कर उसने ₹100 प्रसाद पर रखे और नाम आंखों से बांके बिहारी जी को प्रसाद अर्पित कर दिया।

 अब दर्शन में मन कम लगा रहा है पैसों की चिंता ज्यादा होने लगी वापस जाना है बिहारी जी के सामने उसकी आंखों में आंसू आ गए इतने में पंडित जी ने डब्बा हाथ में पकड़ाया और बोले चलो आगे चलो। वह भक्त बोला पंडित जी यह डब्बा मेरा नहीं है। मेरा तो आधा किलो का था कि आपने किलो का दे दिया ज्यादा भीड़ होने के कारण धक्का-मुक्की में उसे नीचे उतार दिया गया .मन में सोचा कोई बात नहीं ठाकुर जी को प्रसाद छोड़ गया प्रणाम हो गया। जो भी ठाकुर जी की कृपा से मिल गया उसको सर से लगाकर मंदिर से बाहर आया। मंदिर से बाहर आकर उसने प्रसाद का डिब्बा खोला और सोचा थोड़ा सा प्रसाद चखलू जैसे ही डिब्बा खोला तो क्या देखता हैपेड़े के साथ प्रसाद में ₹500 का नोट रखा हुआ है उसकी आंखों में आंसू आ गए ठाकुर जी मेरे पास मात्र डेढ़ सौ रुपए बचे थे घर जाना था इसलिए आंखों में आंसू आ गए थे। लेकिन प्यारे आपने तो मेरे घर जाने की दुविधा ही दूर कर दी। दोनों हाथ जोड़कर ठाकुर जी की चौखट को प्रणाम किया और ठाकुर जी का शुक्रिया करता हुआ ठाकुर जी का नाम लेता हुआ वापस दिल्ली आ गया सबसे बिहारी जी में उसकी श्रद्धा इतनी बढ़ गई कि बार-बार जब भी समय मिलता वृंदावन जाने लगा। श्री बांके बिहारी जी इस प्रकार से अपने भक्तों की छोटी-छोटी परेशानियों को भी दूर करते हैं। वह बांके बिहारी लाल की जय।

🌿प्रेम से कहिए.. श्री बांकेबिहारी लाल की🙏