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धर्म-विशेष

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

गोल्ड न्यूज़ नेट परिवार की और से महाशिव रात्रि के भव्य पर्व पर संपूर्ण  विश्व को हार्दिक शुभकामनाये हर हर महादेव

समुद्र मंथन कहाँ हुआ था

देवता और दानवों ने किया था समुद्र मंथन

पौराणिक कथाओं के अनुसारदेवताओं और असुरों द्वारा मंदराचल पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से किए गए समुद्र मंथन से 14 अमूल्य रत्न निकले। इनमें हलाहल विषकामधेनुऐरावतउच्चैःश्रवा घोड़ाकौस्तुभ मणिकल्पवृक्षरंभालक्ष्मीवारुणीचंद्रमापारिजात वृक्षपांचजन्य शंखधन्वंतरि और अंत में अमृत कलश शामिल थे।

समुद्र मंथन से निकले 14 रत्नों की सूची:

1कालकूट विष (हलाहल): सबसे पहले निकलाजिसे शिवजी ने पिया।

2कामधेनु गाय: ऋषियों को दी गई।

3उच्चैःश्रवा घोड़ा: इंद्र ने लिया।

4ऐरावत हाथी: इंद्र ने लिया।

5कौस्तुभ मणि: विष्णुजी ने धारण की।

6कल्पवृक्ष: स्वर्ग में स्थापित।

7रंभा अप्सरा: देवताओं को मिली।

8देवी लक्ष्मी: विष्णुजी को मिलीं।

9वारुणी (मदिरा): दैत्यों को मिली।

10चंद्रमा: शिवजी ने मस्तक पर धारण किया।

11पारिजात वृक्ष: देवताओं को मिला।

12पांचजन्य शंख: विष्णुजी को मिला।

13भगवान धन्वंतरि: आयुर्वेद के जनक।

14अमृत कलश: धन्वंतरि के हाथ में।

स्थूल दृष्टि से देखें तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने हेतु उस समय की भौगौलिक स्थिति का पता होना भी जरूरी है। ग्रंथों में गहरे घुसेंगे तो पता चलेगा कि बिहारबंगालझारखण्डउड़ीसा आदि समुद्र मंथन के समय जलमग्न थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से भी उस समय थे नहीं।

समुद्रमंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस समय हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी ही भूमि का निर्माण कर पाई थी। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं। इस राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ। अभी भी सबसे प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन इसी निर्माण का प्रमाण है।

कथा है कि जब समुद्रमंथन की बात उठी तो मंदार पर्वत की मथानी तो बना ली गईकूर्मावतार ने आधार भी दे दियालेकिन मथानी की रस्सी कहाँ से लाएँ। उस समय सर्वसम्मति बनी कि हिमालय की कंदराओं में आराम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह काम करवाया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोक और चौदहों भुवन में नहीं हैं।

अब समस्या थी कि उन्हें लाए कौन?

इतने बड़े थे कि लहरिया स्टाइल में रेंगते तो टकराने लगते। इसलिये अधिकतर समय आराम ही करते थे। इस पर कैलाशपति उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेट कर चल दिये। नागराज की डिलीवरी करके भोले एक स्थान पर बैठ गए।

जब मंथन प्रारम्भ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। इधर से देवता खींचेंउधर से असुर खींचेंबीच में मंदराचल चुभे। क्षुब्ध होकर नागराज से फुफकारना शुरू कर दिया। अब सोचिये कि जिस नाग को एक पर्वत के चारों तरफ लपेट दिया गयावह कितना बड़ा होगा। नागराज के फुफकारने से समस्त सृष्टि में जहर फैलने लगा। हाहाकार मच गया।

एक तरफ तो देवता और असुर भाग खड़े हुए और दूसरी तरह नागराज निढाल होकर फुफकारते रह गए।

अब करें तो करें क्या?

देवताओं की मीटिंग बिठाई गई। प्रश्न उठा कि इस हलाहल को कौन पियेगा?

विष्णु भगवान ने भोले बाबा के चरण धर लिये कि बाबा आप ही पी सकते हैं।

जो भोले होते हैंउनके हिस्से ही जहर आता है। बाबा उठे और पहले जहर पिया और फिर वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि निकले भी नहीं थे। उनसे भी पुराने वैद्य हैं वैद्यनाथ।

बाबा ने हलाहल पी तो लियालेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वहीँ एक स्थान देखकर बैठ गए। मंथन शुरू हो गया। मंथन से निकले चन्द्रमा के एक टुकड़े को तोड़ कर निकाला गया और उसे भगवान के सर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस टुकड़े से निरंतर शीतल जल महादेव के सर पर गिरता रहता है।

यह क्षेत्र कहाँ है जहाँ मंथन हुआ था?

बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत के आसपास का क्षेत्र ही मंथन का स्थान है। आज भी झारखण्डबंगालउड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भण्डार है। सबका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मंदार में अब भी समुद्र मंथन से निकली निधियाँ छिपी हुई हैं।

भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थेवह स्थान है वासुकीनाथ। जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थेवह स्थान है वैद्यनाथ धामदेवघर में। चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया थाआज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है।

वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर मंदिर के शिखर के नीचे लगा है। नाम है - चंद्रकांत मणि।